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तसलीमा तुम्हें लोगों की भावनाओं का सम्मान करना होगा

भारत सरकार ने तसलीमा नसरीन का वीजा असिमित समय के लिए सशर्त बढ़ा दिया। धार्मिक भावनाओं को आहत करने आरोप में पहले बंगला देश और फिर कलकत्ता से उन्हें निवार्सन झेलना पढ़ा और आज कल वो भारत सरकार की कैदी मेहमान हैं। अपने शीषर्क वाली बात कहने से पहले में कुछ बाते साफ करना चाहता हूं। मैं बतौर लेखिका तसलीमा का पूरा सम्मान करता हूं और अभिव्क्यति की आजादी पर का भी पक्षधर हूं। साथ ही आम जन के हित में बेबाकी से कलम चलाने के लिए मैं उनकी निडरता की दाद भी देता हूं। अब मैं अपनी बात पर आता हूं, तसलीमा ने अपने धर्म की कुछ पुरानी मान्यताओं पर बेबाक टिप्पणियां की (द्विखंडित में, शायद दूसरी किताबों में भी)। ये टिप्पणियां हजरत साहिब के बारे में हैं। मैं मानता हूं कि धर्म की कुछ गैरजरूरी और अंधविश्वासी धारणाओं के खिलाफ लिखना गल्त नहीं है, लेकिन इस प्रक्रिया के दौरान हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि हमारा संदेश जिन लोगों तक पहुंच रहा हैं, क्या उनकी मानसिकता उतनी विकसित है कि वह हमारे संदेश को उसी भावना से समझ सकें। बस तसलीमा यहीं मार खा गईं। मैं भी नास्तिक हूं, लेकिन मेरा मानना है कि कोई भी जिस भी धर्म को मानता है मैं उसकी भावनाओं का सम्मान करुं। इससे भी महत्वर्णा बात ये है कि लेखक जिन्हें हम बुद्धिजीवी मानते हैं, वह धर्म सहित विभिन्न मामलों के बारे में गहरी समझ रखते हैं और उसी समझ के मुताबिक हर बात को तर्क के तराजू में तौलते हैं। इस लिए वह किसी भी गंभीर मसले पर बेबाकी से बात कर सकते हैं, लेकिन वही बात एक आम जन को समझ नहीं आती। खास कर धर्म के मामले में वह तर्क की बजाए श्रद्धा की आखों से स्थितियों को देखते हैं। डेनमार्क के एक अखबार में हजरत साहिब का काटूर्न छपने के बाद दुनिया भर में जो प्रतिक्रिया हुई उसमें केवल कट्टड़पंथियों की नहीं आम जन की भी भावनाएं शामिल थी। तब मीडिया की सवंत्रता की सीमिओं पर खासी बहस हुई थी। उसी तरह जब तसलीमा की किताब में सीधे मोहम्मद साहिब पर उनकी निजी जिंदगी के बारे में टिप्पणियां की गई, तो कट्टरपंथियों ने विरोध की अगुवाई की, जो बांग्लादेश और पश्चिम बंगाल में उग्र रूप में नजर आईं। मेरा मानना है कि जब तक हम लोंगों की समझ इतनी विकसित नहीं कर लेते कि वह वाक्यों के पीछे की भावनाओं को समझ सकें। तब तक हमें उन्हें समझ आने वाली भाषा में ही लिखना होगा और उसी लिहाज से लफ्जों की सीमाएं तय करनी होंगी। मुझे मालूम हैं कि ज्यादातर लोग मुझ से सहमत नहीं होंगे,लेकिन अगर ऐसे कहूं की बुद्धिजीवियों को अपनी समझ का प्रयोग करते हुए आम लोगों की समझ के स्तर पर उतर कर लिखना होगा। तभी हम बुद्धिजीवियों और आम लोंगों की समझ के बीच की चौड़ी खाई को पाटने में सफल हो पाएंगे। मेरी सलाह है कि एक बार द्विखंडित पड़ने के बाद आप मेरी बात पर गौर फरमाएं। आभार